रेगिस्तानी गांवों की बदलती तस्वीर: चौपालों की जगह मोबाइल स्क्रीन, घटता सांस्कृतिक जीवन

रेगिस्तान के गांवों की पहचान कभी लोकगीतों, चौपालों, सामूहिक जीवन और परंपरागत संस्कृति से होती थी, लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के कारण सामाजिक मेलजोल और पारंपरिक गतिविधियां लगातार कम होती जा रही हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार तकनीक ने जहां सुविधाएं बढ़ाई हैं, वहीं गांवों का सामुदायिक जीवन कमजोर हुआ है। पहले जहां चौपालों पर बैठकों, लोकगीतों और सामूहिक आयोजनों की रौनक रहती थी, अब वह धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। युवाओं का अधिक समय मोबाइल स्क्रीन पर बीत रहा है, जिससे पारंपरिक खेल और लोकसंस्कृति प्रभावित हो रही है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते स्मार्टफोन उपयोग के कारण औसत स्क्रीन टाइम 4 से 6 घंटे तक पहुंच गया है। वहीं कृषि और घरेलू कार्यों में मशीनों के उपयोग से पारंपरिक श्रम आधारित गतिविधियां भी कम हो रही हैं, जिससे लोककौशल और पारंपरिक ज्ञान नई पीढ़ी तक कम पहुंच पा रहा है।

पर्यावरणीय बदलाव भी इस स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं, क्योंकि गांवों में पेड़ों की संख्या घटने से छांव और सामूहिक बैठकों की जगह सीमित हो गई है। इससे ग्रामीण जीवनशैली और अधिक प्रभावित हुई है।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि आधुनिकता आवश्यक है, लेकिन विकास और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि गांवों की पहचान और लोकसंस्कृति सुरक्षित रह सके।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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